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Santoshi Mata Katha

संतोषी माता व्रत कथा

एक बुढ़िया के सात पुत्र थे। छह पुत्र कमाने वाले थे और सबसे छोटा पुत्र सीधा-सादा तथा बेरोजगार था। उसकी पत्नी बहुत ही सरल और धर्मपरायण थी, लेकिन घर में उसे बहुत कष्ट सहने पड़ते थे। सास और जेठानियाँ उसे ताने देतीं और ठीक से भोजन भी नहीं देती थीं। एक दिन छोटा पुत्र रोज़गार की तलाश में परदेस चला गया। जाते समय उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह धन कमाकर जल्दी लौटेगा। पति के जाने के बाद बहू पर अत्याचार और बढ़ गए। दुखी होकर वह भगवान से प्रार्थना करने लगी। एक दिन उसने कुछ महिलाओं को संतोषी माता का व्रत करते देखा। उसने उनसे व्रत की विधि पूछी। महिलाओं ने बताया:

  • शुक्रवार का व्रत रखें।
  • माता को गुड़ और चने का भोग लगाएँ।
  • संतोषी माता की कथा सुनें।
  • खटाई का सेवन बिल्कुल न करें।
  • उसने श्रद्धा और विश्वास से व्रत आरंभ कर दिया।

धीरे-धीरे माता की कृपा से उसके पति को व्यापार में सफलता मिली। उसने घर पैसे भेजने शुरू किए और कुछ समय बाद स्वयं भी घर लौट आया। घर आकर उसने अपनी पत्नी की दशा देखी और बहुत दुखी हुआ।

परीक्षा का समय

पति-पत्नी सुख से रहने लगे, लेकिन जेठानियों को यह अच्छा नहीं लगा। जब 16 शुक्रवार पूरे होने पर उद्यापन किया गया, तब जेठानियों ने बच्चों को खटाई खिला दी। व्रत का नियम टूटने से फिर से कष्ट आने लगे। तब बहू ने अपनी भूल समझी और सच्चे मन से पुनः संतोषी माता का व्रत शुरू किया। माता प्रसन्न हुईं और उनके जीवन में फिर से सुख, शांति और समृद्धि आ गई।

संतोषी माता कथा से मिलने वाली सीख

  • संतोष ही सबसे बड़ा धन है।
  • सच्ची श्रद्धा और धैर्य से माता कृपा करती हैं।
  • ईर्ष्या और क्रोध से दूर रहना चाहिए।
  • नियम और विश्वास के साथ किया गया व्रत फलदायी होता है।
  • संतोषी माता व्रत के मुख्य नियम
  • लगातार 16 शुक्रवार व्रत रखें।
  • गुड़ और चने का प्रसाद चढ़ाएँ।
  • खटाई का सेवन न करें।
  • माता की कथा अवश्य सुनें या पढ़ें।
  • व्रत पूर्ण होने पर उद्यापन करें।

भक्तजन संतोषी माता की पूजा परिवार की सुख-शांति, मनोकामना पूर्ति और समृद्धि के लिए करते हैं।

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